विश्व महिला दिवस पर विशेष


8 मार्च, आज से ठीक 43 साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने महिला दिवस की सुरुआत की थी। भारत में हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विदेशी उत्सव लगे, वेलेंटाइन डे की तरह आखिर लगे भी क्यों न हमारी परंपरा जो ठहरी हम दुनिया से कुछ लेते कहां थे हमने तो सिर्फ दिया है और आज भी कोशिश कर रहे हैं देने की मगर मानसिकता संकीर्ण हो गयी है, नहीं शायद कहना उचित न हो हम नैतिकता वाले लोग हैं, अब प्रश्न यह है कि नैतिकता का आधार क्या है?
विभिन्न सेनाएं और दल जो भारतीय संस्कृति के मसीहा बने फिरते है, उनकी कथनानुसार तो शायद  परिभाषा यही हो सकती है हम हमेशा से संस्कारों वाले रहे है, अजंता व एलोरा से हमारा कोइ संबंध नही रहा, खजुराहो विदेशियों की संस्कृति रही है, प्रेम विवाह कुछ ज्यादा हो जाएगा हमारे इतिहास में तो प्रेम भी नही होते थे राधा और कृष्ण कौन थे वो हमें पता नही मानो  उन्हें शून्य मान लिया गया हो, कामदेव का जो वर्णन वैदिक ग्रंथों में मिलता है शायद वह पश्चिमी साजिस रही हो या फिर विदेशी आर्यों ने भारत की संस्कृति को बदनाम करने के लिए लिखे हों, 
    फिलहाल विषय दूसरा है, आज नारी दिवस है, हम यह कह सकते हैं कि 
हमारे लिए कोइ एक दिन इसके लिए निश्चित नही होता ऐसी चीजों के लिए हर एक दिन एक समान रहता है  जैसा की हम मातृ दिवस पर कहते कहते हैं” कुछ पुराना सा नही लगता।
        तथाकथित वैदिक जानकारों से बात करें तो पता चलता है कि हमारे समाज में महिलाओं की स्थिति हमेशा से बहुत ही अच्छी रही है, वे अनेक बड़े बड़े नामों का वर्णन भी आपके सामने करेंगे जैसे, अपाला, गार्गी , मैत्रेयी इत्यादि। फिर वैदिक काल से सीधे आधुनिक काल में अगर उनसे प्रश्न किया जाए तो उनमें से कुछ तो ऐसे देखते है कि मानो हम प्रचंड वामपंथी है कैसा प्रश्न कर दिया हमने।
    आज दुनिया यह मानती है कि भारत के पास एक विशाल मानव संसाधन है तथा विशाल क्षमता विद्यमान है पर शायद उसे यह नही पता है कि भारत का आधा मानव संसाधन वैदिक काल के बाद से ही गैर संस्कारी रहा है और पिछले 2000 सालों से शेष आधा मानव संसाधन उन्हें संस्कार सिखाने में लगा हुआ है। बात अर्थशास्त्र की है तो स्त्री के गैर कामकाज में गिने जाने वाले असंख्य कामों का भी मूल्यांकन करने का कुछ पैमाना होना चाहिए नही शायद धर्म शास्त्र में ये उनका कर्तव्य बताया गया है, और हम शास्त्रपारायण लोग शास्त्रविमुख कैसे हो सकते हैं,आधुनिक  वैदिक ठेकेदारों की मानें तो छेड़छाड़, बलात्कार, घरेलू हिंसा, लैगिक भेदभाव, दहेज उत्पीड़न ये सब तो इंडिया में होते हैं भारत में नही होते।भारत में स्त्री के विरुद्ध होने वाले अपराधों में बलात्कार चौथा प्रमुख अपराध है और दुर्भाग्य से जो भारत की परिभाषा में आता है वहां के आंकड़े भी कुछ अलग नही है।
 ये तथाकथित जानकार ये नही बताएंगे कि वैदिक काल के बाद इन्होंने नारी की क्या दुर्दशा  की, यदि भारत की नारी इस पुरुष प्रधान समाज में भारत के सर्वोच्च पद तक पहुँची तो यह उसकी असीम शक्ति का प्रमाण है।
    अब एक बात तो सर्वविदित है कि महिलाओं मे असीम शक्ति है जिसपर किसी को संदेह हो तो उसका शायद जन्म ही निरर्थक कहा जाएगा। महिला को यदि पुरुष से बढ़कर न माना जाए तो वह उससे कम भी नही है आज हम युवाओं पर इस बात की जिम्मेदारी है कि हम कैसे भारत का निर्माण करना चाहते हैं, प्रसिद्ध वाक्य है कि  “A chain is as strong as it’s a weakest link. कहीं ऐसा न हो की संस्कृति और सभ्यता के दम्भ में हम ईसा पूर्व में ही रह जाएं, वैश्विक आधुनिकता को ती
व्र गति से  अपने में आत्मसात कर रहे युवा को  स्त्री का सम्मान करना होगा एक माता, एक बहन, एक पत्नी और सबसे प्रमुख एक स्वतंत्र मानव होने के कारण, यदि हमारे लिए धर्म शास्त्रों के अनुशार चलना मुश्किल हो तो हम संविधान के अनुसार चलें  ताकि देश की हर एक कमजोर कड़ी को मजबूत कर सकें। इसी के साथ एक बेहतर भारत के सृजन की आशा के साथ आप सभी मनुष्यों(विशेष) को नारी शक्ति की व महिला दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।

--दीपक दूबे


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