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Showing posts from May, 2018

कड़वी बात

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"हमारे देश में कोइ बलात्कार तभी मुद्दा बनता है जबकि कि वो हमारे द्वारा सोचे गये तरीके से मेंल न खाता हो। " कड़वा है पर सच है "जब हम बलात्कार की खबर पढ़ते हैं तो पहले उसकी मानसिक तौर पर कल्पना(बलात्कार) करते हैं (जैसे कि कठुआ केस में हुआ , कैसी कैसी बातें , जैसे उसे इंजेक्सन देकर होश में लाया गया इत्यादि इत्यादि) यदि बलात्कार का तरीका हमारे दिमाग में सोचे गये तरीके से जरा भी मेल खाता है तो हम अखबार एक तरफ रख देते हैं , जैसे देश में रोज कइ बलात्कार की घटनाएं होती हैं पर हम विरोध में खड़े नहीं दिखते जाहिर सी बात है कि रेप के तरीके का आंशिक रूप से ही सही हमनें सही ठहराया ,  जब मष्तिष्क सही नहीं ठहरा पाता तो फिर शुरु होती है मोमबत्ती जलाने की प्रथा उससे पहले तो हम मोमबत्तियां तक नहीं उठाते इसके विरोध में 🕯️🕯️🕯️, फेसबुक पर.............................. ✍ ️

भारत सरकार ने वर्ष 2018 को “राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष” (National Year of the Millet) घोषित किया है। भारतीय संदर्भ में इसकी आवश्यकता एवं उपयोगिता पर प्रकाश डालिये।(200 शब्द)

भारत की अधिकांश जनसंख्या के निम्न आय वर्ग में होने के कारण यहां पर कुपोषण   की समस्या   काफी विकट है जिसे दूर करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें अपने  स्तर पर प्रयास करती रही   हैं , परंतु सीमित संसाधनों व विकासशील देश होने के कारण   इस पर अभी पूरी तरह काबू नहीं पाया   जा सका है , सरकार इसके लिए गरीबों को  PDS  के माध्यम से अनाज उपलब्ध करा रही है , इसी   दिशा में आगे बढ़ते हुए सरकार ने पीडी- एस के माध्यम से निम्न और मध्यम आय वर्गों को मोटा अनाज   प्रदान करने की कोशिश   कर रही है , पहले से तमिलनाडू जैसे राज्य मोटा अनाज प्रदान करते रहे हैं ,  मोटे अनाजों   में खनिज तत्व गेहूं व चावल की तुलना में भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं , इसके साथ ही ये  अनाज शुष्क एवं अर्ध शुष्क स्थानों पर भी उगाए जा सकते हैं , भारत में निम्म व मध्यम आय  वर्ग की समस्या कैलोरी के बजाए खनिज तत्वों की है। मोटे अनाज में पोषक तत्वों की  भरपूर मात्रा होने के   कारण यह भारत में कुपोषण की समस्या का समाधान हो सकता है , कम वर्षा वाल...
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वो गया तो अपने संग उजाले भी ले गया, मानो कि आफताब भी रौशन उसी से था।। उन नयनों की शोखियों से रहना जरा बचके, उन नयनों के जख्मी को चाराग़र न मिलेगा।                       तपती दुपहरी में भी जो आबाद रहा करती थी, अब तो सावन में भी वीरान नज़र आती हैं।।               नाचीज़ पर यूँ ही इन्हें बेकार ना करें, अनमोल हैं आपके दो लफ़्ज भी ज़नाब।               निग़ाहों ने तुम्हें जिस दिन से देखा,  ये मुझमें भी तुम्हें ही ढूढती हैं।।          हो जिन्हें होश वो तारीफ-ए-हुश्न से उलझें, कि उनको देखकर हम होश में नहीं रहते।।         उस हाथ को हथियार की ज़रूरत ही क्या जनाब, कुदरत ने अता की हों जिन्हें कातिलाना आंखें।।      ...

जब तक शास्त्रों की सत्ता को अंतिम माना जाता रहेगा, तब तक हिन्दू समाज में कोई बुनियादी सुधार नहीं हो सकता।

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प्रारंभिक भारत के इतिहास से ही भारत में कइ मिस्र संस्कृतियां पनपी जिन्होंने समेंकित होकर भारत में आधुनिक हिंदू संस्कृति की नीव रखी। लिखित प्रमाणों के आधार पर आर्यों का प्रमुख ग्रंथ माना जाने वाला ऋग्वेद हो या फिर दक्षिण का संगम साहित्य या फिर यहां पर विकसित होने वाले ब्राम्हणीय ग्रंथ, ये सब अलग अलग समय पर अलग अलग दर्शनों को लेकर विकसित हुए, ऋग्वेद में दशम् मण्डल के संशोधन हों या फिर मनुस्मृति और शतपथ ब्राम्हण में संशोधन हम पाते हैं कि जब - जब जो विचारधारा प्रबल रही उसने अपने अनुसार इन ग्रंथों को ढाल दिया।  यदि किसी हिंदू से यादृच्छिक रूप से यह प्रश्न किया जाए कि उसका धर्मग्रंथ क्या है तो बहुत संभव है कि वह निश्चित नहीं कर पायेगा, अकेले रामायण को लेकर भारत में पचास से अधिक कहानियां पायी जाती हैं, संस्कारों की बात करें तो वैवाहिक संस्कारों में भी उत्तर और दक्षिण में तथा अन्य कइ स्थानो पर विविधता पायी जाती है, मांसाहार वर्जित हिंदू धर्म  में वैदिक काल में कुछ स्थानों पर मांस खाने के संकेत मिलते हैं, बंगाल के ब्राम्हणों को भी कुछ विशेष प्रकार की मछलियां खाने की अनुमति दी ...

बदलता राजनीतिक परिदृश्य

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आजकल देश के शीर्ष नेताओं मे खुद को बड़ा हिन्दू साबित करने की होड़ लगी हुई है, बीते 25 वर्षों से हिंदुत्व को पेटेंट कराने वाले लोगों को यह बात गले नहीं उतर रही है , आखिर उतरे भी क्यों पच्चीस वर्षों से जिस हिंदुत्व की सवारी करके दिल्ली तक का सफर किया, उस एकाधिकार पर कोई प्रश्नचिन्ह लगाए तो तकलीफ तो होगी ही। राहुल गांधी को यह बात जल्दी समझ जानी चाहिए थी परन्तु उन्हें परिपक्व होने मे काफी देर लगी, खैर देर आए दुरुस्त आए, फिलहाल गुजरात चुनाव मे इसका कोई फायदा शायद ही नजर आए, जरूरत है कि राहुल दीर्घकालीन नीति पर चलें, क्योंकी अभी तो उन्होने स्वीकार किया है, अभी सर्टिफिकेट लेना बाकी है। नेता को खुद को हिंदू बताने पर गाय काटने वाला कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है, पेटेंट के कारण उसे सर्टिफ़िकेट देने से इन्कार किया जा रहा है। क्या हिंदुत्व के पैरोकार बताएंगे कि उन्होंने कितने राज्यों को कत्लखानों से मुक्त करवा दिया। कत्लखाने चाहे एक चलते हों या हजार क्या फर्क पड़ता है। फिलहाल हिंदुत्व के एकाधिकारियों से मेरा प्रश्न कि आखिर क्या कारण है कि राहुल के खुद को हिंदू बता देने से आपको आपना पेटेंट ...

भारतीय राजनीति में धर्म का प्रवेश व बदलता परिदृश्य

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अपनी सभ्यता के आरम्भिक चरण मे मनुष्य ने क्रूरता व पाशविक प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त करने के लिये नीतियों व आचरणों को महिमामंडित करना शुरू किया। मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति को दबाने के लिये किये गये ये प्रयास बाद मे धर्म का रूप लेते गये। अनेक महाद्वीपों मे जैसे जैसे चेतना का संचार हुआ अनेक धर्म आकार लेते गये। सौभाग्य से भारत भूमि पर विकसित सनातन धर्म को दुनिया का प्रथम धर्म होने का गौरव प्राप्त है। अपनी मजबूत नीव के कारण यह धर्म हजारों वर्षों के वैचारिक संघर्ष के बावजूद अपने को जीवंत किये हुए है।       सैकड़ो वर्षों की गुलामी के बाद भी इसके मूल विचार अडिग रहे, महात्मा बुद्ध, चाणक्य, चार्वाक, सूर, तुलसी से लेकर विवेकानन्द व दयानन्द सरस्वती, तथा राजा राममोहन राय से गांधी तक उतार चढाव के अनेक दौर से गुजरने के बाद आज यह  ‘ हिंदू ’  नाम से जाना जाता है। नेहरू   ने, जो कि चार्वाक दर्शन को स्वीकार करते थे, भारत को एक वैज्ञानिक चिंतन की ओर अग्रसर करने का प्रयत्न किया। परन्तु कालांतर में नेहरू के चार्वाक दर्शन को जिसे सेकुलर नाम दे दिया गया अपने उद्देश्य ...

राजनीतिक चिंतन

“ राजनीति ” एक ऐसा विषय जिसपर लिखने के लिए किसी विशेष तरह की योग्यता की आवश्यकता नहीं होती, एक ऐसा विषय जिसपर आपसे गुमटी वाले से लेकर कोइ भी व्यक्ति गाँव की समस्या से लेकर भारत फ्रांस संबंधों पर भी बहस कर सकता हैं, फर्क नही पड़ता की आपके पास किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित उपाधि हो या न हो, बस आपको तनिक धूर्तता आनी चहिए। आपको लगेगा आप एक कुशल राजनीतिक स्तंभकार या विश्लेषक की तरह विश्लेषण कर सकते हैं। आवश्यक भी है क्योंकी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति व्यक्ति के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, हर व्यक्ति को अधिकार है कि वह हर उस चीज के बारे में चिंतन करे जो उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करती है। अर्थात् हमारे देश का हर एक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है, तो फिर समस्या कहां है, राजनीति से आसान काम कोइ हो ही नही सकता किसी चुनाव में जातिगत गणित के आधार पर कोइ निर्णय देना, या फिर बहुसंख्यक व अल्पसंख्यकों की राजनीति करना, बहुत कम दिमाग की आवश्यकता पड़ती है, लोग दिमाग लगाते भी कम हैं क्योंकी उनकी अपनी निजी पहचान को उनकी सामुदायिक पहचान क...

विश्व महिला दिवस पर विशेष

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8 मार्च, आज से ठीक 43 साल पहले संयुक्त राष्ट्र ने महिला दिवस की सुरुआत की थी। भारत में हो सकता है कि कुछ लोगों को यह विदेशी उत्सव लगे, वेलेंटाइन डे की तरह आखिर लगे भी क्यों न हमारी परंपरा जो ठहरी हम दुनिया से कुछ लेते कहां थे हमने तो सिर्फ दिया है और आज भी कोशिश कर रहे हैं देने की मगर मानसिकता संकीर्ण हो गयी है, नहीं शायद कहना उचित न हो हम नैतिकता वाले लोग हैं, अब प्रश्न यह है कि नैतिकता का आधार क्या है ? विभिन्न सेनाएं और दल जो भारतीय संस्कृति के मसीहा बने फिरते है, उनकी   कथनानुसार तो शायद  परिभाषा यही हो सकती है  “ हम हमेशा से संस्कारों वाले रहे है, अजंता व एलोरा से हमारा कोइ संबंध नही रहा, खजुराहो विदेशियों की संस्कृति रही है, प्रेम विवाह कुछ ज्यादा हो जाएगा हमारे इतिहास में तो प्रेम भी नही होते थे राधा और कृष्ण कौन थे वो हमें पता नही मानो  उन्हें शून्य मान लिया गया हो, कामदेव का जो वर्णन वैदिक ग्रंथों में मिलता है शायद वह पश्चिमी साजिस रही हो या फिर विदेशी आर्यों ने भारत की संस्कृति को बदनाम करने के लिए लिखे हों, ”       फिलहाल विषय दूसरा ...