बदलता राजनीतिक परिदृश्य
आजकल
देश के शीर्ष नेताओं मे खुद को बड़ा हिन्दू साबित करने की होड़ लगी हुई है, बीते
25 वर्षों से हिंदुत्व को पेटेंट कराने वाले लोगों को यह बात गले नहीं उतर रही है, आखिर उतरे भी क्यों पच्चीस वर्षों से जिस
हिंदुत्व की सवारी करके दिल्ली तक का सफर किया, उस एकाधिकार पर कोई प्रश्नचिन्ह
लगाए तो तकलीफ तो होगी ही।
राहुल
गांधी को यह बात जल्दी समझ जानी चाहिए थी परन्तु उन्हें परिपक्व होने मे काफी देर
लगी, खैर देर आए दुरुस्त आए, फिलहाल गुजरात चुनाव मे इसका कोई फायदा शायद ही नजर
आए, जरूरत है कि राहुल दीर्घकालीन नीति पर चलें, क्योंकी अभी तो उन्होने स्वीकार
किया है, अभी सर्टिफिकेट लेना बाकी है। नेता को खुद को हिंदू बताने पर गाय काटने
वाला कहकर मजाक उड़ाया जा रहा है, पेटेंट के कारण उसे सर्टिफ़िकेट देने से इन्कार
किया जा रहा है। क्या हिंदुत्व के पैरोकार बताएंगे कि उन्होंने कितने राज्यों को
कत्लखानों से मुक्त करवा दिया। कत्लखाने चाहे एक चलते हों या हजार क्या फर्क पड़ता
है।
फिलहाल
हिंदुत्व के एकाधिकारियों से मेरा प्रश्न कि आखिर क्या कारण है कि राहुल के खुद को
हिंदू बता देने से आपको आपना पेटेंट अधिकार का हनन होता लग रहा है। आपकी झुंझलाहट
जाने अनजाने मे काफी कुछ बयां करती है।
मै
किसी से तीन वर्षों के कार्यकाल का जवाब नहीं माँग रहा ना ही नाना, दादी, पापा से
लेकर युवराज से उनके सत्तर वर्षों का जवाब मांग रहा हूँ, इन लोकतंत्र के मसीहाओं
से मेरा सिर्फ यही प्रश्न है कि ‘नेहरूवियन
समाजवाद से बढ़कर लोहिया व जयप्रकाश नरायण के समाजवाद(यहां मेरा तात्पर्य कथित
समाजवादी दलों से नहीं जिनका दूर दूर तक समाजवाद से कोई सरोकार नहीं है) से लेकर
90 के बाद के दशक के उदारवाद व उसके बाद पूँजीवाद के मार्ग पर अग्रसर भारतीय
अर्थव्यवस्था के सामने प्रमुख मुद्दे क्या हैं, चुनाव उन मुद्दों के साथ लड़े जाएं
तो शायद लोकतंत्र की सार्थकता बनी रहे।
यदि
सरकार सभी कत्लखानों को बन्द नहीं कर सकती तो उसे दिखावा करने की भी जरूरत नहीं
इससे बेहतर है कि भारत के मीट एक्सपोर्ट को बेहतर बनाया जाए, शराब पर प्रतिबंध नही
लगा सकते तो क्यूं न गोवा की तरह टूरिज्म सेक्टर का विकास किया जाए। राम मंदिर का
मुद्दा उच्चतम न्यायालय पर ही छोड़ दिया जाए तो ज्याद बेहतर हो, मसीहाओं की तरफ से
राजनीतिक बयानबाजी पर लगाम लगायी जाए। जिस गुजरात माडल का हौव्वा खड़ा किया गया था
उसकी हकीकत सबके सामने है। बर्बरता का परित्याग किया जाए क्यों की किसी विचारक ने
लिखा है कि ‘मनुष्य को इतिहास की आधे से अधिक
त्रासदियों को मात्र इसलिए झेलना पड़ा क्योंकी वह बर्बरता के अतिरिक्त कोइ विकल्प
तलासने मे असफल रहा।‘
जरूरत
है एक ऐसे हिंदुस्तान की जिसमे विकास Trickle Down Theory के आधार पर न होकर अन्त्योदय की विचारधारा पर
आधारित हो, जहाँ समाज का सबसे कमजोर वर्ग भी गर्व से अपने को लोकतंत्र का भागीदार
बताए। जहां टकराव का समाधान त्रासदी नहीं बल्कि बातचीत हो। जहां चुनाव
मंदिरो-मस्जिदों व कब्रिस्तान व श्मशान से आगे बढकर इंसानियत के आधार पर लड़े
जाएं। इससे जिस सनातन परंपरा में जिस हिंदू राष्ट्र व गांधी के राम राज्य की
स्थापना की बात होती है वह एक धर्मनिरपेक्ष देश में बिना संविधान संशोधन के ही
संभव हो जाए।(फिलहाल संविधान के आधारभूत ढांचे की संकल्पना की वजह से संविधान
संशोधन तो संभव नहीं है क्यों न हम खुद में ही कुछ अति आवश्यक संशोधन करें। पं
श्रीराम शर्मा ने कहा था कि “हम
बदलेंगे युग बदलेगा,
हम सुधरेंगे युग सुधरेगा )
------------------------------- दीपक दूबे

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