लेख- दीपक कुमार दूबे, विषय- मनुवाद और उसकी कमियाँ 


एकबार किसी ने हमसे प्रश्न किया कि “क्या आप मनुवाद को मानते है?” हमने रक्षात्मक मुद्रा मे कहा कि देश
मनुस्मृति से नही बल्कि संविधान से चलता है, दंडविधान भारतीय दंड संहिता द्वारा निर्धारित होते है फिर यह कैसा प्रश्न है कि मनुवाद या शरीयत को मानते हैं या नहीं। परंतु महाशय अपनी पूरी जिज्ञाशा शांत करने के लिए तत्पर थे तो उन्होंने कहा कि बेशक आप सही है परंतु क्या यथार्थ स्थिति यही है। ब्राम्हणवादियों(मनुवादियों) का प्रभाव नहीं है। आपको नहीं लगता कि ब्राम्हणवाद की समाप्ति होने से ही इस देश में समानता आ सकती है, भारत की सारी समस्याओ की जड़ मे ब्राम्हणवाद है? इस प्रश्न ने हमें सोचने के लिए विवश किया कि शायद इस व्यक्ति की जिज्ञाशा सही है।
परंतु उन्होंने प्रश्न मेरे ब्राम्हण होने के कारण किया था, शायद उनका मानना था कि जो ब्राम्हण है वही ब्राम्हणवादी है।
मै तो स्वयंवाद का समर्थक रहा हूं किसी भी वाद का बिना विश्लेषण किये मान लेना मेरे विरुद्ध था। मैने कहा कि आप ब्राम्हणवाद से हिंदुस्तान को अलग करने का कोइ मार्ग बताएं हम उसपर विचार करेंगे। महाशय निरुत्तर थे।
 वास्तव में “ब्राम्हणों के द्वारा बनायी गयी व्यवस्था को मानने वाला हर एक व्यक्ति ब्राम्हणवादी है” इस बात से इंकार करना मुश्किल है कि भारत में निवास करने वाले हर एक संप्रदाय पर ब्राम्हणवाद का प्रभाव है, चाहे वो हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई, यहूदी, पारसी कोइ भी हों, हिंदुस्तान की चेतन और अवचेतन, व्यष्टि और समष्टि प्रत्येक स्तर या यूं कहा जाए कि समस्त हिंदुस्तान ही चाहे वो भाषा हो संस्कृति हो सभ्यता हो सब उसी व्यवस्था की ही देन है, यदि आर्य और द्रविणों के तथाकथित संघर्ष को छोड़ दिया जाए तो इतिहास का कोइ भी ऐसा ज्ञात संघर्ष नहीं है जो जातिगत आधार पर हुआ यह व्यवस्था के गौरव का प्रतीक है। यदि आप यह कहते हैं कि उपरोक्त व्यवस्था इतनी दमनकारी थी कि किसी ने उसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाइ तो आप वही बात कहते हैं जैसा कि उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मंत्री ने दंगे पर कहा था कि एक वर्ग डरा हुआ है इसलिए दंगा नही हो रहा, तो क्या उस वर्ग को दंगा करने के लिए उर्जा देने की आवश्यकता है कितना हास्यास्पद है। वास्तव में “पंद्रह बनाम पिचासी के नारे को विफल करने की अदृश्य ताकत ही ब्राम्हणवाद है।“
जहां तक बात समानता की है तो दुनिया की कोइ भी व्यवस्था समानता को स्थापित नहीं कर सकती। आरक्षण को यदि समानता मानते हैं तो कृपया पुनर्विचार करें यह भी Survival of fittest की उसी पश्चिमी अवधारणा पर आधारित है। भारतीय आरक्षण पद्धति को ना तो दीन दयाल उपाध्याय का अंत्योदय और न ही राल्स का नियम किसी आधार पर सही कह सकता है इसमें तो ब्राम्हणवाद नही था। हां अवसर की समानता की बात की जाए तो वह भी उन्हें संविधान द्वारा प्रदत्त है। जब प्रकृति में ही समानता नहीं है तो मानव प्रकृति की व्यवस्था को कैसे चुनौती दे सकता है, असमानता एक विषद् प्रश्न है।
हजारों वर्षों से चल रही किसी भी व्यवस्था में कमियां अपरिहार्य है इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता जैसे कर्म पर आधारित जाति व्यवस्था को जन्म पर आधारित कर दिया गया, ऋग्वेद के जिस पुरुषसूक्त का हवाला लोग देते हैं स्वयं उन्ही के मसीहा मैक्समूलर ने उसे बाद में जोड़ा गया बताया है, गीता मे श्री भगवान का कथन- “चातुर्वण्यं मया श्रष्टं गुणकर्मविभागशः” अर्थात गुणों और कर्मों के आधार पर विभाजित यह समस्त सृष्टि मेरी ही रचना है। इस बात का प्रमाण है। कमियां दूर भी हो रही हैं पर सुधार की बजाए किसी व्यवस्था के समूल नाश की बात करना मूर्खता ही कहा जाएगा।
 रही बात खतरे की तो खतरा उस वाद से नहीं है जो 5000 वर्षों से भारत की सभ्यता और संस्कृति को अक्षुण्य रखे है खतरा उनसे है जो आज बिना किसी विकल्प के एक व्यवस्था को समाप्त करने की बात करते हैं, ठीक है महत्वाकांक्षा अलग विषय है पर आपको पहले उससे सटीक कोइ विकल्प देना होगा। और विकल्प भी कौन है वामपंथ वो वामपंथ जिसने चीन में आंदोलनकारियों पर टैंक चलवाया था वो वामपंथ जिसका विध्वंश वर्षों दुनिया के सामने ही नही आने दिया गया। क्या आपको पता है जिस व्यवस्था के विरोध के लिए आप महीने में एक बार भारत बंद करते है माओत्से तुंग ने चार करोड़ लोगों को उसी की वजह से मारा था माँग बस ये थी की उन्हें व्यवस्था से समस्या थी। जिस व्यवस्था को समाप्त करने की बात आज हो रही है उसके बिना हिंदुस्तान एक बिना अस्थियों के शरीर के अलावा कुछ नहीं। किसी और की अस्थियों को उसमें डालने की बजाए हम यदि एक परिष्कृत व्यवस्था का निर्माण कर सकें तो यह अधिक युक्तिसंगत होगा।
मै इन नवचिंतको से यही कहना चाहूंगा कि ये व्यवस्था में सुधार बाहर से नहीं बल्कि अंदर से करने का प्रयास करें। इन्हें बौद्ध या जैन दर्शन से संदर्भ देने की आवश्यकता नहीं सबकुछ ब्राम्हणीय ग्रंथों में ही उपलब्ध है चाहे वो गीता हो रामायण हो या महाभारत हो।
इतिहास का कोइ भी शासक भारत की जाति व्यवस्था को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल नहीं कर सका परंतु वर्तमान में परिस्थितियां बदल चुकी है राजनीतिक दल इस अभेद्य समझी जाने वाली व्यवस्था को भेद चुके हैं तथाकथित उच्चतम जातियां भी वोटबैंक बन चुकी हैं, आज जो यह विरोध है सब उसी के द्वारा आरोपित किया हुआ है। हमें इन षड़यंत्रकारी ताकतों से सावधान रहकर 15 बनाम 85 को भूलकर मिलकर एक नये भारत का निर्माण करना होगा।

आलोचना अपेक्षित है
नोट- ये मेरे निजी विचार हैं यदि कहीं टकराव है तो आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत करने मे हमे उसके समर्थन से अधिक खुशी होगी

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