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विश्व महिला दिवस

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                          पाकिस्तान का समाधान                                                                 ( लेख- दीपक कुमार दूबे)                          शीर्षक की तरह निश्चित ही यह आसान नहीं है। प्रत्येक देश या व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने इतिहास से या अपने पूर्व कृत्यों से कुछ न कुछ सीख ले परंतु, 1947,1965,1971,1999 में चार बार युद्ध में हार का सामना करने के बाद भी पाकिस्तान के इतिहासकार इसे उनकी जीत बना कर प्रचारित करते हैं और पुनः युद्धोन्माद का निरंतर सृजन कर रहे हैं।         पाकिस्तान सेना के मुताबिक वे भारत के साथ 25 दिन तक युद्ध के लिए सक्षम हैं परंतु उनकी अर्थव्यवस्था को यदि मिला दिया जाए तो $17 billion से  वो चंद दिनों तक भी युद्ध करने की स्थ...
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           💐🙏 सैन्य कार्यवाई के सबूत 💐🙏 (written by Deepak Dubey)  प्रो. अमर्त्य ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के अतिक्रमण को झेलने की विवशता को गरीबी कहा है। संभवतः कुछ ऐसी ही स्थिति आज इमरान खान की है। संदेहास्पद लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को सेना की कठपुतली तो माना ही जाता रहा है वैश्विक बिरादरी ने भी उनके राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों का अतिक्रमण शुरू कर दिया जहां एक तरफ FATF(Financial action task force) नें उसे ग्रे लिस्ट में रखा है वहीं इस्लामिक देश भी उससे किनारा करते नजर आने लगे है। सामाजिक पतन के जिम्मदार तो वह स्वयं है।           पुलवामा हमले के बाद उत्पन्न तनाव के बाद भारत ने सीमापार पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी प्रतिष्ठानों पर मिराज विमानों के द्वारा बमबारी करके इसे आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्यवाई के रूप में प्रचारित किया। इस आक्रमक कार्यवाई के बावजूद भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह मनवाने में भी सफल रहा कि भारत की यह कार्यवाई पाकिस्तान के विरुद्ध न होकर आतंकवाद के विरुद्ध है। हमले से तिलमिलाए...
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लेख- दीपक कुमार दूबे, विषय- मनुवाद और उसकी कमियाँ  एकबार किसी ने हमसे प्रश्न किया कि “क्या आप मनुवाद को मानते है?” हमने रक्षात्मक मुद्रा मे कहा कि देश मनुस्मृति से नही बल्कि संविधान से चलता है, दंडविधान भारतीय दंड संहिता द्वारा निर्धारित होते है फिर यह कैसा प्रश्न है कि मनुवाद या शरीयत को मानते हैं या नहीं। परंतु महाशय अपनी पूरी जिज्ञाशा शांत करने के लिए तत्पर थे तो उन्होंने कहा कि बेशक आप सही है परंतु क्या यथार्थ स्थिति यही है। ब्राम्हणवादियों(मनुवादियों) का प्रभाव नहीं है। आपको नहीं लगता कि ब्राम्हणवाद की समाप्ति होने से ही इस देश में समानता आ सकती है, भारत की सारी समस्याओ की जड़ मे ब्राम्हणवाद है? इस प्रश्न ने हमें सोचने के लिए विवश किया कि शायद इस व्यक्ति की जिज्ञाशा सही है। परंतु उन्होंने प्रश्न मेरे ब्राम्हण होने के कारण किया था, शायद उनका मानना था कि जो ब्राम्हण है वही ब्राम्हणवादी है। मै तो स्वयंवाद का समर्थक रहा हूं किसी भी वाद का बिना विश्लेषण किये मान लेना मेरे विरुद्ध था। मैने कहा कि आप ब्राम्हणवाद से हिंदुस्तान को अलग करने का कोइ मार्ग बताएं हम उसपर विचार करे...

अटल बिहारी वाजपेयी एक युगपुरुष

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सन् 2000 जब मुझे विद्यालयी शिक्षा में प्रवेश दिलाया गया था, दुनिया ने 21वीं सदी में प्रवेश लिया था उस समय अटल जी भारत के 21वीं सदी में प्रवेश द्वार के प्रहरी थे, उस समय बालकपन तो था राजनीति और कूटनीति की समझ भी नहीं थी धीरे-धीरे सांसारिक विषयों से परिचय होना शुरू ही हुआ था इसी क्रम में अटल जी को देख कर ही वहीं से राजनीतिक विषयों के लिए वैचारिक अंकुरण प्रस्फुटित हुआ। बाद में उनकी कविताओं से भी परिचय हुआ "रग रग हिंदू मेरा परिचय" पहली रचना मैने पढ़ी, उनकी कविताओं में एक अलग ही भाव रहता था मानो कि एक संबोधन हो!  ना तो कोइ धर्म की समझ ना जाति की समझ बस एक व्यक्तित्व था जो प्रभावित करता था, अटल जी की कइ सारी कहानिया सुनते थे कि कैसे इस महान राजनेता ने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में व्याख्यान दिया था, चीन के संदर्भ में संसद में कहा कि "परमाणु बम का जवाब सिर्फ परमाणु बम है उससे कम कुछ भी नहीं" 1998 में पोखरण का मैदान जिसका साक्षी बना। एक ऐसा जननेता जिसका विपक्ष होता था पर विरोधी नहीं। अटल जी ने एक ऐसे समय सत्ता संभाली जब अर्थशास्त्री चिदंबरम की राजकोषीय नीति असफल...

कड़वी बात

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"हमारे देश में कोइ बलात्कार तभी मुद्दा बनता है जबकि कि वो हमारे द्वारा सोचे गये तरीके से मेंल न खाता हो। " कड़वा है पर सच है "जब हम बलात्कार की खबर पढ़ते हैं तो पहले उसकी मानसिक तौर पर कल्पना(बलात्कार) करते हैं (जैसे कि कठुआ केस में हुआ , कैसी कैसी बातें , जैसे उसे इंजेक्सन देकर होश में लाया गया इत्यादि इत्यादि) यदि बलात्कार का तरीका हमारे दिमाग में सोचे गये तरीके से जरा भी मेल खाता है तो हम अखबार एक तरफ रख देते हैं , जैसे देश में रोज कइ बलात्कार की घटनाएं होती हैं पर हम विरोध में खड़े नहीं दिखते जाहिर सी बात है कि रेप के तरीके का आंशिक रूप से ही सही हमनें सही ठहराया ,  जब मष्तिष्क सही नहीं ठहरा पाता तो फिर शुरु होती है मोमबत्ती जलाने की प्रथा उससे पहले तो हम मोमबत्तियां तक नहीं उठाते इसके विरोध में 🕯️🕯️🕯️, फेसबुक पर.............................. ✍ ️

भारत सरकार ने वर्ष 2018 को “राष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष” (National Year of the Millet) घोषित किया है। भारतीय संदर्भ में इसकी आवश्यकता एवं उपयोगिता पर प्रकाश डालिये।(200 शब्द)

भारत की अधिकांश जनसंख्या के निम्न आय वर्ग में होने के कारण यहां पर कुपोषण   की समस्या   काफी विकट है जिसे दूर करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें अपने  स्तर पर प्रयास करती रही   हैं , परंतु सीमित संसाधनों व विकासशील देश होने के कारण   इस पर अभी पूरी तरह काबू नहीं पाया   जा सका है , सरकार इसके लिए गरीबों को  PDS  के माध्यम से अनाज उपलब्ध करा रही है , इसी   दिशा में आगे बढ़ते हुए सरकार ने पीडी- एस के माध्यम से निम्न और मध्यम आय वर्गों को मोटा अनाज   प्रदान करने की कोशिश   कर रही है , पहले से तमिलनाडू जैसे राज्य मोटा अनाज प्रदान करते रहे हैं ,  मोटे अनाजों   में खनिज तत्व गेहूं व चावल की तुलना में भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं , इसके साथ ही ये  अनाज शुष्क एवं अर्ध शुष्क स्थानों पर भी उगाए जा सकते हैं , भारत में निम्म व मध्यम आय  वर्ग की समस्या कैलोरी के बजाए खनिज तत्वों की है। मोटे अनाज में पोषक तत्वों की  भरपूर मात्रा होने के   कारण यह भारत में कुपोषण की समस्या का समाधान हो सकता है , कम वर्षा वाल...
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वो गया तो अपने संग उजाले भी ले गया, मानो कि आफताब भी रौशन उसी से था।। उन नयनों की शोखियों से रहना जरा बचके, उन नयनों के जख्मी को चाराग़र न मिलेगा।                       तपती दुपहरी में भी जो आबाद रहा करती थी, अब तो सावन में भी वीरान नज़र आती हैं।।               नाचीज़ पर यूँ ही इन्हें बेकार ना करें, अनमोल हैं आपके दो लफ़्ज भी ज़नाब।               निग़ाहों ने तुम्हें जिस दिन से देखा,  ये मुझमें भी तुम्हें ही ढूढती हैं।।          हो जिन्हें होश वो तारीफ-ए-हुश्न से उलझें, कि उनको देखकर हम होश में नहीं रहते।।         उस हाथ को हथियार की ज़रूरत ही क्या जनाब, कुदरत ने अता की हों जिन्हें कातिलाना आंखें।।      ...