पाकिस्तान का समाधान
(लेख- दीपक कुमार दूबे)
शीर्षक की तरह निश्चित ही यह आसान नहीं है। प्रत्येक देश या व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने इतिहास से या अपने पूर्व कृत्यों से कुछ न कुछ सीख ले परंतु, 1947,1965,1971,1999 में चार बार युद्ध में हार का सामना करने के बाद भी पाकिस्तान के इतिहासकार इसे उनकी जीत बना कर प्रचारित करते हैं और पुनः युद्धोन्माद का निरंतर सृजन कर रहे हैं।
पाकिस्तान सेना के मुताबिक वे भारत के साथ 25 दिन तक युद्ध के लिए सक्षम हैं परंतु उनकी अर्थव्यवस्था को यदि मिला दिया जाए तो $17 billion से वो चंद दिनों तक भी युद्ध करने की स्थिति में नहीं हैं। यहां एक विकल्प चीन के समर्थन व युद्ध व्यय को वहन करने का है परंतु इतिहास गवाह है कि 1965 से लेकर 1999 तक किसी भी युद्ध में चीन ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया और इस बार भी उसने किनारा कर लिया है।
ऐसे मे आतंकवाद उनके लिए एक सस्ता और दीर्घकालिक विकल्फ हो सकता है। कुर्बान अली डाक्ट्रिन के आधार पर ‘भारत को उसके अंदर 1000 घाव दे दिया जाए ताकि वो घुटनों के बल बैठ कर कश्मीर हमें सौंप दे’ पाकिस्तान भारत में छद्म युद्ध के द्वारा आतंकवाद को फैलाता आ रहा है। वास्तव में भारत के साथ चार प्रमुख लड़ाइयां लड़ चुका यह देश जानता है कि वह भारत के साथ पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकता या उसमें संभावित क्षति बहुत अधिक है। लिहाजा पाकिस्तान सीमा पार से इन आतंकवाद संबंधी कार्यावाहियों को अंजाम देता है। जवाबी कार्यवाही से बचने के लिए परमाणु संपंन्न राष्ट्र होने के कारण पाकिस्तान भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देकर ब्लैकमेल भी करता रहा है।
Proxy War(छद्म युद्ध) पर आधारित पाकिस्तानी आतंकवाद कम खर्च में ही अधिक समय तक चलने वाला खेल है जिसे वहां की सेना और खुफिया एजेंसियों के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। यदि इसे भारत में पाकिस्तान संबंधी अबतक की परंपरागत नीतियों के द्वारा सामना किया जाता रहेगा तो यह हमारे लिए एक नासूर ही साबित होगा और मानवता के लिए अभिशाप बन चुके रक्षा व्यय में ही उलझे रहना होगा। बेहतर है कि पाकिस्तान के युद्ध व्यय को बढ़ा दिया जाए तथा त्वरित कूटनीति के द्वारा लंबे समय तक युद्ध या युद्ध जैसे माहौल को भी झेलने में असमर्थ पाकिस्तान को आतंकवाद पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। संभवतः इसे ध्यान में रखकर नयी दिल्ली ने अपनी पाक नीतियों में बदलाव किया है। भारत नें इजरायली रणनीति The Begin doctrine( आरंभ का सिद्धांत) के आधार पर आगे बढ़कर कार्यावाही कर रक्षात्मक आक्रामकता परिचय दिया है। कल हमारी सेना पाकिस्तान के जाल में जरूर फंसी पर हमारे जांबाज पायलट ने मिग-21 से एफ-16 को गिराने की जिस बहादुरी का परिचय दिया है वह काबिल-ए-तारीफ है।
युद्ध से इंकार तो नहीं किया जा सकता क्योंकी "गरीबी राजनीति का तो युद्ध कूटनीति का प्रबलतम अस्त्र है" निश्चित तौर पर यदि युद्ध होता है तो नुकसान दोनो तरफ का होगा। दिवालिएपन की कगार पर खड़ी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था भुखमरी की चपेट में आ जाएगी। दक्षिण एशिया वैश्विक शक्तियों का अखाड़ा बन जाएगा, परमाणु बम का इस्तेमाल युद्ध को टालने के लिए ही हो तो बेहतर है अन्यथा जनरलों का पागलपन ही मानवता के विनाश का कारण होगा। गैर सैन्य विकल्पों की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए जैसे आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को घेरने व वैश्विक मंच पर उसे बेनकाब और अलग करने का निरंतर प्रयास होना चाहिए जिसमें हम काफी कुछ सफल भी रहे हैं। फिलहाल आज तो साहिर लुधियानवी की यह पंक्तियां भी उचित नहीं लगतीं “कि ऐ शरीफ इंसानों जंग टलती रहे तो बेहतर है” परंतु जंग वैचारिक होनी चाहिए कूटनीतिक होनी चाहिए क्योंकि किसी महान विचारक ने कहा है कि मनुष्य को इतिहास की आधे से अधिक त्रासदियों को मात्र इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि वह युद्ध का विकल्प तलाशने में असफल रहा।🙂🙏🙏💐
(लेख- दीपक कुमार दूबे)
शीर्षक की तरह निश्चित ही यह आसान नहीं है। प्रत्येक देश या व्यक्ति से यह आशा की जाती है कि वह अपने इतिहास से या अपने पूर्व कृत्यों से कुछ न कुछ सीख ले परंतु, 1947,1965,1971,1999 में चार बार युद्ध में हार का सामना करने के बाद भी पाकिस्तान के इतिहासकार इसे उनकी जीत बना कर प्रचारित करते हैं और पुनः युद्धोन्माद का निरंतर सृजन कर रहे हैं।
पाकिस्तान सेना के मुताबिक वे भारत के साथ 25 दिन तक युद्ध के लिए सक्षम हैं परंतु उनकी अर्थव्यवस्था को यदि मिला दिया जाए तो $17 billion से वो चंद दिनों तक भी युद्ध करने की स्थिति में नहीं हैं। यहां एक विकल्प चीन के समर्थन व युद्ध व्यय को वहन करने का है परंतु इतिहास गवाह है कि 1965 से लेकर 1999 तक किसी भी युद्ध में चीन ने पाकिस्तान का साथ नहीं दिया और इस बार भी उसने किनारा कर लिया है।
ऐसे मे आतंकवाद उनके लिए एक सस्ता और दीर्घकालिक विकल्फ हो सकता है। कुर्बान अली डाक्ट्रिन के आधार पर ‘भारत को उसके अंदर 1000 घाव दे दिया जाए ताकि वो घुटनों के बल बैठ कर कश्मीर हमें सौंप दे’ पाकिस्तान भारत में छद्म युद्ध के द्वारा आतंकवाद को फैलाता आ रहा है। वास्तव में भारत के साथ चार प्रमुख लड़ाइयां लड़ चुका यह देश जानता है कि वह भारत के साथ पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकता या उसमें संभावित क्षति बहुत अधिक है। लिहाजा पाकिस्तान सीमा पार से इन आतंकवाद संबंधी कार्यावाहियों को अंजाम देता है। जवाबी कार्यवाही से बचने के लिए परमाणु संपंन्न राष्ट्र होने के कारण पाकिस्तान भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देकर ब्लैकमेल भी करता रहा है।
Proxy War(छद्म युद्ध) पर आधारित पाकिस्तानी आतंकवाद कम खर्च में ही अधिक समय तक चलने वाला खेल है जिसे वहां की सेना और खुफिया एजेंसियों के द्वारा प्रायोजित किया जाता है। यदि इसे भारत में पाकिस्तान संबंधी अबतक की परंपरागत नीतियों के द्वारा सामना किया जाता रहेगा तो यह हमारे लिए एक नासूर ही साबित होगा और मानवता के लिए अभिशाप बन चुके रक्षा व्यय में ही उलझे रहना होगा। बेहतर है कि पाकिस्तान के युद्ध व्यय को बढ़ा दिया जाए तथा त्वरित कूटनीति के द्वारा लंबे समय तक युद्ध या युद्ध जैसे माहौल को भी झेलने में असमर्थ पाकिस्तान को आतंकवाद पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। संभवतः इसे ध्यान में रखकर नयी दिल्ली ने अपनी पाक नीतियों में बदलाव किया है। भारत नें इजरायली रणनीति The Begin doctrine( आरंभ का सिद्धांत) के आधार पर आगे बढ़कर कार्यावाही कर रक्षात्मक आक्रामकता परिचय दिया है। कल हमारी सेना पाकिस्तान के जाल में जरूर फंसी पर हमारे जांबाज पायलट ने मिग-21 से एफ-16 को गिराने की जिस बहादुरी का परिचय दिया है वह काबिल-ए-तारीफ है।
युद्ध से इंकार तो नहीं किया जा सकता क्योंकी "गरीबी राजनीति का तो युद्ध कूटनीति का प्रबलतम अस्त्र है" निश्चित तौर पर यदि युद्ध होता है तो नुकसान दोनो तरफ का होगा। दिवालिएपन की कगार पर खड़ी पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था भुखमरी की चपेट में आ जाएगी। दक्षिण एशिया वैश्विक शक्तियों का अखाड़ा बन जाएगा, परमाणु बम का इस्तेमाल युद्ध को टालने के लिए ही हो तो बेहतर है अन्यथा जनरलों का पागलपन ही मानवता के विनाश का कारण होगा। गैर सैन्य विकल्पों की अवहेलना नहीं की जानी चाहिए जैसे आर्थिक मोर्चे पर पाकिस्तान को घेरने व वैश्विक मंच पर उसे बेनकाब और अलग करने का निरंतर प्रयास होना चाहिए जिसमें हम काफी कुछ सफल भी रहे हैं। फिलहाल आज तो साहिर लुधियानवी की यह पंक्तियां भी उचित नहीं लगतीं “कि ऐ शरीफ इंसानों जंग टलती रहे तो बेहतर है” परंतु जंग वैचारिक होनी चाहिए कूटनीतिक होनी चाहिए क्योंकि किसी महान विचारक ने कहा है कि मनुष्य को इतिहास की आधे से अधिक त्रासदियों को मात्र इसलिए झेलना पड़ा क्योंकि वह युद्ध का विकल्प तलाशने में असफल रहा।🙂🙏🙏💐

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