वो गया तो अपने संग उजाले भी ले गया,
मानो कि आफताब भी रौशन उसी से था।।
उन नयनों की शोखियों से रहना जरा बचके,
उन नयनों के जख्मी को चाराग़र न मिलेगा।
तपती दुपहरी में भी जो आबाद रहा करती थी,
अब तो सावन में भी वीरान नज़र आती हैं।।
नाचीज़ पर यूँ ही इन्हें बेकार ना करें,
अनमोल हैं आपके दो लफ़्ज भी ज़नाब।
निग़ाहों ने तुम्हें जिस दिन से देखा,
ये मुझमें भी तुम्हें ही ढूढती हैं।।
हो जिन्हें होश वो तारीफ-ए-हुश्न से उलझें,
कि उनको देखकर हम होश में नहीं रहते।।
उस हाथ को हथियार की ज़रूरत ही क्या जनाब,
कुदरत ने अता की हों जिन्हें कातिलाना आंखें।।
फ़ज़ां के रंग फ़ीके पड़ रहे हैं,
तेरे चेहरे की हरियाली के आगे।
कौन कहता है कि ठण्ढी में बहारें नहीं आती ,
हम तो खिजाओं में भी बहारों का मजा लेते थे।
उनकी अदाओं के तो कहने ही क्या यारों,
फ़कत निगाह से घायल यहां हजारों हैं।।
तुम्हारी चूड़ियों की खनखनाहट में सुनो जाना,
ज़माने के सभी संगीतों की ध्वनियां खनकती हैं।
बस इसी बात में अबतो सभी खुशियां हमारी है,
कि उनके खास लोगों में हमारी भी शुमारी है।।
कि उनके खास लोगों में हमारी भी शुमारी है।।
दीपक दूबे -मनोकृति








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