💐🙏सैन्य कार्यवाई के सबूत💐🙏
(written by Deepak Dubey)
प्रो. अमर्त्य ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के अतिक्रमण को झेलने की विवशता को गरीबी कहा है। संभवतः कुछ ऐसी ही स्थिति आज इमरान खान की है। संदेहास्पद लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को सेना की कठपुतली तो माना ही जाता रहा है वैश्विक बिरादरी ने भी उनके राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों का अतिक्रमण शुरू कर दिया जहां एक तरफ FATF(Financial action task force) नें उसे ग्रे लिस्ट में रखा है वहीं
इस्लामिक देश भी उससे किनारा करते नजर आने लगे है। सामाजिक पतन के जिम्मदार तो वह स्वयं है।
पुलवामा हमले के बाद उत्पन्न तनाव के बाद भारत ने सीमापार पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी प्रतिष्ठानों पर मिराज विमानों के द्वारा बमबारी करके इसे आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्यवाई के रूप में प्रचारित किया। इस आक्रमक कार्यवाई के बावजूद भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह मनवाने में भी सफल रहा कि भारत की यह कार्यवाई पाकिस्तान के विरुद्ध न होकर आतंकवाद के विरुद्ध है। हमले से तिलमिलाए पाकिस्तान ने भारत की वायुसीमा का अतिक्रमण करने का प्रयास किया और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का प्रयास किया जिसे भारतीय वायुसेना द्वारा असफल कर दिया गया। दुर्भाग्य से हमारा एक पायलट पाक अधिकृत कश्मीर में गिर गया।
1999 में कारगिल युद्ध के समय नवाज शरीफ की सरकार ने ग्रुप कैप्टन नचिकेता को जेनेवा कन्वेंशन के आधार पर रिहा किया था, इससे पहले भी भारत के द्वारा 1971 के 93,000 युद्ध बंदियों को पाकिस्तान को सौंपा गया है। परंतु इस बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बिनाशर्त रिहाई का जो राग आलाप रहे हैं वह भी निराधार है, उन्होंने इसे लेकर सौदेबाजी का प्रयास किया। स्वयं इमरान खान पाक संसद में कहते हुए देखे जा सकते हैं कि उन्होंने भारत को कई बार संपर्क करने की कोशिश की और बातचीत शुरू करनी चाही। परंतु भारत के न झुकने के कारण उन्हें अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते बिना शर्त रिहा करना पड़ा।
पुनः नोबेल की आड़ में इमरान नें कश्मीर पर पुराना राग ही दोहराया है। इमरान खान को शांति का मशीहा करार देने वाले ध्यान दें कि वो सिर्फ सेना की कठपुतली हैं। पाक सेना और सरकार के संबंधों से जो वाकिफ हों उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है कि कारगिल के युद्ध का खाका नवाज शरीफ के पीठ पीछे ही मुसर्ऱफ ने खींचा था।
विगत कुछ दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से भारतीय कार्यवाई में मारे गये लोगों के सबूत मांगे जा रहे है, संभव है कि वो मिलने के बाद ये उनके नाम पते की भी मांग कर सकते है। उन्हें पाक मीडिया और सरकार की इस बात पर विश्वास है कि 1,000 किलो के बमों के गिरने पर सिर्फ 2-3 पेड़ों को नुकसान पहुंचा है और हमारी इंटेलीजेंस इतनी कमजोर है कि हम LOC से 80 किलोमीटर अंदर 2-3 पेंड़ों को तोड़ने गए थे। उनके समर्थक स्वामी भक्ति और चाटुकारिता में इस तरह अंधे हो चुके हैं कि उन्हें उसके नाम पर देश विरोध भी स्वीकार है। काश उनकी बौद्धिकता भी इतनी विकसित होती कि वो सोच पाते कि उन्ही की बातों को ढाल बनाकर पाक और पाक मीडिया उन्हीं के विरूद्ध जनसमर्थन तैयार कर रहा है। शर्म की बात है कि इन्हें उस पाकिस्तान पर भरोसा है जिसने कारगिल और कई मौकों पर अपने सैनिकों के शवों को लेने से भी मना कर दिया था। जगजाहिर है कि 1947 के युद्ध में कबायली हमला पाकिस्तान के सैनिकों ने किया था पर पाक सरकार उसे आज तक नहीं मानती। चार लड़ाइयों में मुह की खाने के बाद भी जो इसे विजय दिवस के रूप में मनाते हैं वो सेना और देश आखिर अपने ही आतंकियों के मौत की खबर को आखिर क्यों स्वीकार करेगी। लोकतंत्र यदि आपको इतनी स्वतंत्रता देता है तो इस बात का ध्यान रखें कि आप से कुछ कर्तव्यों की भी अपेक्षा करता है।
वाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति तीन घटकों पर आधारित थी- वहां के मुख्य क्षेत्रीय पार्टियों को मजबूत करना, अलगाववादियों से बातचीत, पाकिस्तान को सामिल करना। परंतु मोदी सरकार ने इन सबको किनारे कर एक नयी नीति का आगाज किया है। यदि आपको 1947 के बाद से अबतक कुछ हासिल नहीं हुआ तो हो सकता है कि आगे कुछ वर्षों तक भी न हो क्या फर्क पड़ता है। सरकार विरोध के अंधानुकरण में देशविरोध की ओर अग्रसर युवा से मेरा प्रश्न है कि यदि सरकार मृतकों के आंकड़े बता देती है तो उससे उनका क्या फायदा होगा और कुछ मानसिक दिवालिया तथाकथित मुसलमानों से मेरा अनुरोध है कि पूर्वी पाकिस्तान(वर्तमान बांग्लादेश) में मुसलमानों का कत्लेआम सत्ता में अंधे उसी पाकिस्तान ने किया था जिसके समर्थन में समय समय पर आवाजें उठती रहती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कहते है कि “भारत कभी भी विदेशी शक्तियों से नही हारा, यह हमेंशा अंदर के शत्रुओं से हारा है।
भारत के द्वारा इस कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि आतंकवाद के विरुद्ध जंग में भारत ने अपनी नीति में बदलाव किया है और आगे भी ऐसे मौकों पर ऐसी कार्यवाहियां की जाएंगी पाकिस्तान के लिए एक संदेश था कि वह अपनी आतंकवाद की नीतियों और जुल्फिकार अली भुट्टो की 1000 वर्षों तक युद्ध जारी रखने की नीतियों से बाज आए। 💐💐🙏
(written by Deepak Dubey)
प्रो. अमर्त्य ने सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों के अतिक्रमण को झेलने की विवशता को गरीबी कहा है। संभवतः कुछ ऐसी ही स्थिति आज इमरान खान की है। संदेहास्पद लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को सेना की कठपुतली तो माना ही जाता रहा है वैश्विक बिरादरी ने भी उनके राजनीतिक, आर्थिक अधिकारों का अतिक्रमण शुरू कर दिया जहां एक तरफ FATF(Financial action task force) नें उसे ग्रे लिस्ट में रखा है वहीं
इस्लामिक देश भी उससे किनारा करते नजर आने लगे है। सामाजिक पतन के जिम्मदार तो वह स्वयं है।
पुलवामा हमले के बाद उत्पन्न तनाव के बाद भारत ने सीमापार पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी प्रतिष्ठानों पर मिराज विमानों के द्वारा बमबारी करके इसे आतंकवाद के विरुद्ध कठोर कार्यवाई के रूप में प्रचारित किया। इस आक्रमक कार्यवाई के बावजूद भारत अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यह मनवाने में भी सफल रहा कि भारत की यह कार्यवाई पाकिस्तान के विरुद्ध न होकर आतंकवाद के विरुद्ध है। हमले से तिलमिलाए पाकिस्तान ने भारत की वायुसीमा का अतिक्रमण करने का प्रयास किया और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने का प्रयास किया जिसे भारतीय वायुसेना द्वारा असफल कर दिया गया। दुर्भाग्य से हमारा एक पायलट पाक अधिकृत कश्मीर में गिर गया।
1999 में कारगिल युद्ध के समय नवाज शरीफ की सरकार ने ग्रुप कैप्टन नचिकेता को जेनेवा कन्वेंशन के आधार पर रिहा किया था, इससे पहले भी भारत के द्वारा 1971 के 93,000 युद्ध बंदियों को पाकिस्तान को सौंपा गया है। परंतु इस बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने बिनाशर्त रिहाई का जो राग आलाप रहे हैं वह भी निराधार है, उन्होंने इसे लेकर सौदेबाजी का प्रयास किया। स्वयं इमरान खान पाक संसद में कहते हुए देखे जा सकते हैं कि उन्होंने भारत को कई बार संपर्क करने की कोशिश की और बातचीत शुरू करनी चाही। परंतु भारत के न झुकने के कारण उन्हें अंतर्राष्ट्रीय दबावों के चलते बिना शर्त रिहा करना पड़ा।
पुनः नोबेल की आड़ में इमरान नें कश्मीर पर पुराना राग ही दोहराया है। इमरान खान को शांति का मशीहा करार देने वाले ध्यान दें कि वो सिर्फ सेना की कठपुतली हैं। पाक सेना और सरकार के संबंधों से जो वाकिफ हों उन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है कि कारगिल के युद्ध का खाका नवाज शरीफ के पीठ पीछे ही मुसर्ऱफ ने खींचा था।
विगत कुछ दिनों में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से भारतीय कार्यवाई में मारे गये लोगों के सबूत मांगे जा रहे है, संभव है कि वो मिलने के बाद ये उनके नाम पते की भी मांग कर सकते है। उन्हें पाक मीडिया और सरकार की इस बात पर विश्वास है कि 1,000 किलो के बमों के गिरने पर सिर्फ 2-3 पेड़ों को नुकसान पहुंचा है और हमारी इंटेलीजेंस इतनी कमजोर है कि हम LOC से 80 किलोमीटर अंदर 2-3 पेंड़ों को तोड़ने गए थे। उनके समर्थक स्वामी भक्ति और चाटुकारिता में इस तरह अंधे हो चुके हैं कि उन्हें उसके नाम पर देश विरोध भी स्वीकार है। काश उनकी बौद्धिकता भी इतनी विकसित होती कि वो सोच पाते कि उन्ही की बातों को ढाल बनाकर पाक और पाक मीडिया उन्हीं के विरूद्ध जनसमर्थन तैयार कर रहा है। शर्म की बात है कि इन्हें उस पाकिस्तान पर भरोसा है जिसने कारगिल और कई मौकों पर अपने सैनिकों के शवों को लेने से भी मना कर दिया था। जगजाहिर है कि 1947 के युद्ध में कबायली हमला पाकिस्तान के सैनिकों ने किया था पर पाक सरकार उसे आज तक नहीं मानती। चार लड़ाइयों में मुह की खाने के बाद भी जो इसे विजय दिवस के रूप में मनाते हैं वो सेना और देश आखिर अपने ही आतंकियों के मौत की खबर को आखिर क्यों स्वीकार करेगी। लोकतंत्र यदि आपको इतनी स्वतंत्रता देता है तो इस बात का ध्यान रखें कि आप से कुछ कर्तव्यों की भी अपेक्षा करता है।
वाजपेयी सरकार की कश्मीर नीति तीन घटकों पर आधारित थी- वहां के मुख्य क्षेत्रीय पार्टियों को मजबूत करना, अलगाववादियों से बातचीत, पाकिस्तान को सामिल करना। परंतु मोदी सरकार ने इन सबको किनारे कर एक नयी नीति का आगाज किया है। यदि आपको 1947 के बाद से अबतक कुछ हासिल नहीं हुआ तो हो सकता है कि आगे कुछ वर्षों तक भी न हो क्या फर्क पड़ता है। सरकार विरोध के अंधानुकरण में देशविरोध की ओर अग्रसर युवा से मेरा प्रश्न है कि यदि सरकार मृतकों के आंकड़े बता देती है तो उससे उनका क्या फायदा होगा और कुछ मानसिक दिवालिया तथाकथित मुसलमानों से मेरा अनुरोध है कि पूर्वी पाकिस्तान(वर्तमान बांग्लादेश) में मुसलमानों का कत्लेआम सत्ता में अंधे उसी पाकिस्तान ने किया था जिसके समर्थन में समय समय पर आवाजें उठती रहती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल कहते है कि “भारत कभी भी विदेशी शक्तियों से नही हारा, यह हमेंशा अंदर के शत्रुओं से हारा है।
भारत के द्वारा इस कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि आतंकवाद के विरुद्ध जंग में भारत ने अपनी नीति में बदलाव किया है और आगे भी ऐसे मौकों पर ऐसी कार्यवाहियां की जाएंगी पाकिस्तान के लिए एक संदेश था कि वह अपनी आतंकवाद की नीतियों और जुल्फिकार अली भुट्टो की 1000 वर्षों तक युद्ध जारी रखने की नीतियों से बाज आए। 💐💐🙏

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