कड़वी बात
"हमारे
देश में कोइ बलात्कार तभी मुद्दा बनता है जबकि कि वो हमारे द्वारा सोचे गये तरीके
से मेंल न खाता हो।"
कड़वा है पर सच है "जब
हम बलात्कार की खबर पढ़ते हैं तो पहले उसकी मानसिक तौर पर कल्पना(बलात्कार) करते
हैं (जैसे कि कठुआ केस में हुआ, कैसी कैसी बातें, जैसे उसे इंजेक्सन देकर होश में लाया गया इत्यादि इत्यादि) यदि
बलात्कार का तरीका हमारे दिमाग में सोचे गये तरीके से जरा भी मेल खाता है तो हम
अखबार एक तरफ रख देते हैं,जैसे देश में रोज कइ बलात्कार की घटनाएं होती हैं पर हम विरोध में
खड़े नहीं दिखते जाहिर सी बात है कि रेप के तरीके का आंशिक रूप से ही सही हमनें
सही ठहराया, जब मष्तिष्क सही नहीं ठहरा पाता तो फिर शुरु होती है मोमबत्ती जलाने
की प्रथा उससे पहले तो हम मोमबत्तियां तक नहीं उठाते इसके विरोध में🕯️🕯️🕯️, फेसबुक पर..............................✍️

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