भारतीय राजनीति में धर्म का प्रवेश व बदलता परिदृश्य
अपनी सभ्यता के आरम्भिक चरण मे मनुष्य ने क्रूरता व पाशविक प्रवृत्ति पर विजय प्राप्त करने के लिये नीतियों व आचरणों को महिमामंडित करना शुरू किया। मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति को दबाने के लिये किये गये ये प्रयास बाद मे धर्म का रूप लेते गये। अनेक महाद्वीपों मे जैसे जैसे चेतना का संचार हुआ अनेक धर्म आकार लेते गये। सौभाग्य से भारत भूमि पर विकसित सनातन धर्म को दुनिया का प्रथम धर्म होने का गौरव प्राप्त है। अपनी मजबूत नीव के कारण यह धर्म हजारों वर्षों के वैचारिक संघर्ष के बावजूद अपने को जीवंत किये हुए है।
सैकड़ो वर्षों की गुलामी के बाद भी इसके मूल विचार अडिग रहे, महात्मा बुद्ध, चाणक्य, चार्वाक, सूर, तुलसी से लेकर विवेकानन्द व दयानन्द सरस्वती, तथा राजा राममोहन राय से गांधी तक उतार चढाव के अनेक दौर से गुजरने के बाद आज यह ‘हिंदू’ नाम से जाना जाता है। नेहरू ने, जो कि चार्वाक दर्शन को स्वीकार करते थे, भारत को एक वैज्ञानिक चिंतन की ओर अग्रसर करने का प्रयत्न किया। परन्तु कालांतर में नेहरू के चार्वाक दर्शन को जिसे सेकुलर नाम दे दिया गया अपने उद्देश्य से पूर्णतयाः विमुख हो गया, धर्म का प्रयोग राजनीति के लिये होने लगा, धार्मिक तुष्टीकरण को सेकुलर का पर्याय माना जाने लगा, बहुसंख्यक कल्याण की कीमत पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण शुरू हुआ तो इसने थमने का नाम नहीं लिया। 1990 में कारसेवकों पर गोली चलाने से उपजी राजनीति 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस का गवाह बनी।
यद्यपि की शुरुआती कुछ दशकों तक भारत मे एक पार्टी विशेष का ही वर्चस्व रहा परन्तु बाद मे उभरी अनेक पार्टियों ने भी कभी भी इस तुष्टीकरण की राजनीति का विरोध नहीं किया बल्कि वे तुष्टीकरण मे कांग्रेस से भी आगे निकल गये। कौन ज्यादा मुस्लिम परस्त है इस बात से धर्मनिरपेक्षता की नयी परिभाषा देने की कोशिश की गयी। चुनावों को मूल मुद्दों से हटाकर सिर्फ सांप्रदायिक आधार तैयार किया गया। 90 के दशक के बाद भारतीय राजनीति में अहम मोड़ आना शुरू हुआ। मंडल आयोग व बाबरी मस्जिद इस दशक की राजनीति को प्रभावित करने वाले प्रधान कारक रहे। इनके सुप्रभावों व दुष्प्रभावों के बीच का सीमांकन जरा मुश्किल है, परन्तु एक बात साफ है कि इसने भारतीय समाज को काफी विभाजित कर दिया ना सिर्फ साम्प्रदायिक आधार पर बल्कि जातिगत आधार पर भी, क्षेत्रीय पार्टियों ने लोगों के बीच काफी वैमनस्यता फैलाने का कार्य किया। जिसकी प्रत्यक्ष उदाहरण कथित समाजवादी व दलित दल हैं। इसके साथ ही भारतीय राजनीति में दक्षिणपंथ मजबूत होकर उभरा, बंटे हुए हिंदुत्व को समेकित करने की विचारधारा को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने राजनीतिक जमीन तैयार करनी शुरू की, यही वह समय था जब कथित धर्मनिरपेक्ष दलों को अपनी सेकुलरिज्म की नीतियों की विवेचना करनी चाहिए थी। परन्तु आज पंचायत से लेकर सर्वोच्च पद तक दक्षिणपंथ की पहुच के जिम्मेदार ये राजनेता अपनी तुष्टीकरण की राजनीति पर कायम रहे।अल्पसंख्यक वोटबैंक बन ही चुका था आखिर में बहुसंख्यक जनता ने भी एक नागरिक के स्थान पर एक मतदाता होना स्वीकार किया। तुष्टीकरण की यदि बात की जाए तो भाजपा ने समाज के एक बड़े गुट को साथ लाने मे सफलता प्राप्त की इससे तुष्टीकरण का अधिकतम श्रेय क्षेत्रीय दलों व कांग्रेस को ही गया।
सनातन धर्म को हिंदू नाम दे दिया गया हिंदू विरोध को धर्मनिरपेक्ष नाम दे दिया गया। एसे मे अब प्रश्न यह है कि क्या अब चुनाव धर्म के ही आधार पर लड़े जाएंगे।
2014 की भयानक पराजय के बाद कांग्रेस ने अपनी नीतियों की समीक्षा शुरू की तो उसका प्रमुख कारण, सेकुलरिज्म की गलत परिभाषा को पाया गया। नेहरू व गाधीवादी राजनीति की आड़ में जिस धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित किया गया तथा अनेक दलों ने इसका सहारा लेकर लगभग 60 वर्षों तक शासन किया अब राहुल गांधी उस विचारधारा से निकाल कर पार्टी की छवि बहुसंख्यक विरोधी छवि से उदारवादी बनाने के लिए प्रयासरत है। परन्तु कांग्रेस को दक्षिणपंथ से दूर ही रहना चाहिए क्योंकी एक बड़ी दक्षिणपंथी ताकत वहां पहले से ही मौजूद है। ऐसे मे राहुल के पास विकल्प यह बचता है कि मध्यम विचारधारा के वो नागरिक(वर्तमान में मतदाता) जो उसकी छद्म धर्मनिरपेक्षता व भाजपा के छद्म राष्ट्रवाद के बीच लटके हुए हैं, को आकर्षित करें। क्योंकी वास्तविकता यही है कि मध्यम मार्ग ही चिरस्थायी है, भारत में ना तो वामपंथ बहुत सक्रिय हो सका और ना ही दक्षिणपंथ सतत् रहेगा परन्तु एक मध्यमपंथ हमेशा रहेगा, परन्तु जरूरी है कि उसे तटस्थ रखा जाए। किसी पंथ या मजहब के प्रति झुकाव भारत की सांस्कृतिक व सामाजिक विविधता के लिये उपयुक्त नहीं है।
एक राष्ट्रीय पार्टी के द्वारा अपनी नीतियों का पुनरावलोकन भारतीय राजनीति का एक नया अध्याय हो सकता है। इसके नि:संदेह कुछ तत्कालीन दुष्परिणाम होंगे परन्तु कालान्तर में यह एक अच्छी राजनीति की शुरुआत हो सकती है शायद अब धर्मनिरपेक्षता की सही परिभाषा दी जा सकेगी।
(एक तटस्थ राजनीति की नींव पड़ने की उम्मीद में नागरिक और मतदाता के बीच में उलझा हुआ राष्ट्रवादी।)
-दीपक कुमार दूबे

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