जब तक शास्त्रों की सत्ता को अंतिम माना जाता रहेगा, तब तक हिन्दू समाज में कोई बुनियादी सुधार नहीं हो सकता।


प्रारंभिक भारत के इतिहास से ही भारत में कइ मिस्र संस्कृतियां पनपी जिन्होंने समेंकित होकर भारत में आधुनिक हिंदू संस्कृति की नीव रखी।
लिखित प्रमाणों के आधार पर आर्यों का प्रमुख ग्रंथ माना जाने वाला ऋग्वेद हो या फिर दक्षिण का संगम साहित्य या फिर यहां पर विकसित होने वाले ब्राम्हणीय ग्रंथ, ये सब अलग अलग समय पर अलग अलग दर्शनों को लेकर विकसित हुए, ऋग्वेद में दशम् मण्डल के संशोधन हों या फिर मनुस्मृति और शतपथ ब्राम्हण में संशोधन हम पाते हैं कि जब-जब जो विचारधारा प्रबल रही उसने अपने अनुसार इन ग्रंथों को ढाल दिया।
 यदि किसी हिंदू से यादृच्छिक रूप से यह प्रश्न किया जाए कि उसका धर्मग्रंथ क्या है तो बहुत संभव है कि वह निश्चित नहीं कर पायेगा, अकेले रामायण को लेकर भारत में पचास से अधिक कहानियां पायी जाती हैं, संस्कारों की बात करें तो वैवाहिक संस्कारों में भी उत्तर और दक्षिण में तथा अन्य कइ स्थानो पर विविधता पायी जाती है, मांसाहार वर्जित हिंदू धर्म  में वैदिक काल में कुछ स्थानों पर मांस खाने के संकेत मिलते हैं, बंगाल के ब्राम्हणों को भी कुछ विशेष प्रकार की मछलियां खाने की अनुमति दी गयी है, वैदिक कालीन आर्य यज्ञ में विश्वास करते थे वस्तुतः संपूर्ण वैदिक ग्रंथ ही यज्ञ प्रधान है, यज्ञ में पशु हिंशा सामान्य होती थी परंतु समय के साथ ही ब्राम्हणों ने भी वैदिक हिंसा का परित्याग कर दिया, इसी प्रकार भगवान कृष्ण के जिस प्रेमपूर्ण स्वरुप का अनेक कवियों व लेखकों ने वर्णन किया है उसका प्राचीन हिंदू ग्रंथों में कहीं उल्लेख भी नहीं मिलता जिसे कालांतर में शास्त्रसम्मत किया गया, यदि दर्शन की बात की जाए तो द्वैत व अद्वैत दर्शन, कुरीतियों की बात करें तो सती प्रथा, बाल विवाह या फिर मातृ सत्ता का विरोध ऐसे अनेक विषय हैं जो जुड़ते चले गये तथा समाप्त भी हुए, निर्विवाद है कि ये सब समय के साथ परिवर्तन के द्वारा उल्लिखित व प्रचलित हुए तथा समय के साथ ही विलुप्त हो गये।
इससे लगता है कि प्राचीन भारत में भी शास्त्रों को चुनौतियां मिलती रही हैं।
हालांकि शास्त्रो ने व्यक्ति और व्यक्तित्व के विकास में तथा मानव जीवन को एक आदर्श जीवन के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है, परंतु उनका निर्माण अचानक नहीं हुआ। शास्त्र भारत में 5000 वर्षों से परिष्कृति हो रही भारतीय मनीषा का विवरण हैं तथा वे एक पक्षीय न होकर बहुआयामी है
यह सिद्ध करता है कि हिंदू धर्म ना ही किसी एक वाद को लेकर चला ना ही किसी एक नियम से आबद्ध रहा है, वरन यहां एक प्रगतिशील चिंतन का इतिहास रहा है। किसी वाद के खण्डन से जो वाद उत्पन्न होता है, इस बात की प्रायिकता अधिक है कि वह पहले से अधिक निर्विवाद व परिष्कृत होगा। हिंदू धर्म की लोचशीलता ने ही भारत को हजारों वर्षों से एकता के सूत्र में बांधे रखा, वस्तुतः हिंदू दर्शन में सदैव से ही  व्यष्टि और समष्टि से परे देखने की क्षमता रही है, इसने समय के साथ होने वाले हर एक परिवर्तन को आत्मसात किया है। जो यह सिद्ध करता है कि हिंदू धर्म में शास्त्रों की सत्ता न तो एकमात्र है और ना ही अंतिम है।
अतः जब तक शास्त्रों की सत्ता को अंतिम माना जाता रहेगा, तब तक हिन्दू समाज में बुनियादी सुधार असंभव है।
 दीपक कुमार दूबे #मनोकृति

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