राजनीतिक चिंतन
“राजनीति” एक ऐसा विषय जिसपर
लिखने के लिए किसी विशेष तरह की योग्यता की आवश्यकता नहीं होती, एक ऐसा विषय जिसपर
आपसे गुमटी वाले से लेकर कोइ भी व्यक्ति गाँव की समस्या से लेकर भारत फ्रांस
संबंधों पर भी बहस कर सकता हैं, फर्क नही पड़ता की आपके पास किसी प्रतिष्ठित
विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित उपाधि हो या न हो, बस आपको तनिक धूर्तता आनी चहिए।
आपको लगेगा आप एक कुशल राजनीतिक स्तंभकार या विश्लेषक की तरह विश्लेषण कर सकते
हैं।
आवश्यक भी है क्योंकी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति
व्यक्ति के जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है, हर व्यक्ति को अधिकार है
कि वह हर उस चीज के बारे में चिंतन करे जो उसे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से
प्रभावित करती है। अर्थात् हमारे देश का हर एक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति
जागरूक है, तो फिर समस्या कहां है, राजनीति से आसान काम कोइ हो ही नही सकता किसी
चुनाव में जातिगत गणित के आधार पर कोइ निर्णय देना, या फिर बहुसंख्यक व
अल्पसंख्यकों की राजनीति करना, बहुत कम दिमाग की आवश्यकता पड़ती है, लोग दिमाग
लगाते भी कम हैं क्योंकी उनकी अपनी निजी पहचान को उनकी सामुदायिक पहचान के आगे
शून्य कर दिया जाता है, और आश्चर्य की बात ये है कि निजी पहचान व व्यक्तिगत
बौद्धिकता को हार चुके ये व्यक्ति उतनी ही तीव्र गति से अन्य को भी अपने चपेट में
लेने लगते हैं।
राजनीति का यह दौर नया तो नही है पर हमें
वैदिक काल में जाने की भी आवश्यकता नहीं इसके बीज ब्रिटिश शासन के दौर में ढूढे जा
सकते हैं, मूलत: 17वीं सदी मे जब धार्मिक व
जातिगत सुधार शुरू हुए तो सभी वर्गों ने धीरे धीरे सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध
आवाज उठानी शुरू की, बाद में दलित आंदोलन उभरा। जिसके कारण दलितों का समाज से
एकीकरण कम उनका अलगाव ज्यादा हुआ, कारण यह रहा कि दलित समाज ने स्वयं के समग्र समाज से एकीकरण का जो मार्ग अपनाया वह
उन्हें एकीकरण की बजाए अलगाव की ओर अधिक ले गया, निःसंदेह दलित वर्ग समाज का एक
बड़ा वर्ग था, इन्हें अपने सुधार की तरफ बढ़ना चाहिए था जबकि इन्होंने अधिकांश
उर्जा विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं की आलोचना में व्यर्थ की, परिणामतः ये मूल से
भटकते रहे, बौद्ध दर्शन की ओर आकर्षित होने के बाद इन्होंने अन्य दर्शन की ओर
आक्रमक रुख अपनाया, डा. अम्बेडकर कभी भी उग्र विचारधारा के समर्थक नही थे
परंतु कालांतर में जो दलित नेता अपने को बाबा साहब के उत्तराधिकारी बताकर उभरे
उन्होंने दलित समाज में वैमनस्यता ही फैलायी तथा समाज से अलग ही किया, चाहे वो
काशीराम रहे हों जिन्होंने BS4 का
नारा दिया, या बहुजन हिताय की विचारधारा से मायावती सत्ता में आयी। वास्तविकता यह है कि जाति और धर्म के बिना
राजनीति भारत में हमेंशा से एक कठिन विषय रहा है, 1960-70 के दशक के बाद जयप्रकाश
नारायण, राममनोहर लोहिया, राजनारायण जैसे कुछ विचारक व राजनीतिज्ञ उभरे किंतु इनके
बाद इनकी विचारधारा के साथ जो बलात्कार इनके उत्तराधिकारियों ने किया उसके उदाहरण
खुद को जयप्रकाश नारायण के शिष्य मानने वाले लालू हों या फिर लोहिया को आदर्श
मानने वाले मुलायम सिंह यादव हों सर्वविदित है।
आज ये लोग भी समाज को उसी दिशा मे ले जा
रहे हैं जहां दलित नेताओं ने पहुंचाया, समाजवाद से इनका दूर दूर तक कोइ सम्बन्ध
नहीं है, जिस विचारधारा का विरोध करके राममनोहर लोहिया व जयप्रकाश नारायण दिल्ली
तक पहुँचे, इन्होने उसी विचारधारा के साथ कइ बार रास रचाया, एसे में इन्होंने
विकल्प के तौर पर जाति को माध्यम बनाया, सामाजिक वैमनस्यता फैलाने का कार्य निरंतर
जारी है, इन्हें क्षेत्रीय दल भी कहना शायद उपयुक्त न हो क्योंकी क्षेत्रीय
मुद्दों से इनका कोइ विशेष संबंध नही रहा, ये जातिगत दल हैं। एक विराट सास्कृतिक पृष्ठभूमि वाले देश में राजनीति का इस हद तक गिरना
निःसंदेह चिंतन का विषय है।
हम आचार्य चाणक्य के
वंशज है, जिन्होंने राजनीति व समाज के समग्र आयामो पर प्रकाश डालती अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “अर्थशास्त्र” में ऐसी राजनीति व
राष्ट्रनीति का वर्णन किया है जो आज के विकसित देशों में भी मिलना दुर्लभ है। पर
हम उसकी आलोचना में लग जाते है, निश्चित तौर पर आलोचना करें 2500 वर्ष पहले जो बात
कही गयी वह वर्तमान अत्याधुनिक समाज में पूर्णतः लागू नही की जा सकती, किंतु किसी विचारधारा से उसकी अच्छाइयों को सीखने में कोइ बुराइ तो नहीं।
आप राजनीति मे हिस्सा लें क्योंकी चाणक्य कहते हैं कि “राजनीति
में हिस्सा न लेने का सबसे बड़ा दण्ड यह है कि अयोग्य व्यक्ति आपपर शासन करने लगते
हैं।“
जाति व्यवस्था भारत का हमेशा से अभिन्न अंग रहा है, स्वयं भगवान श्रीकृष्ण गीता मे
कहते है “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः” अर्थात्
गुणों एवं कर्मों के आधार पर चार वर्णों में विभाजित यह श्रृष्टि मेरी ही रचना है।
फिर टकराव कैसा गुरु नानक कहते है “एक नूर से सब जग उपजा” पर अफसोस इस बात का
है कि आज एसे महानायकों का समाज में अभाव है। हमें वैदिक दर्शन को समझने की
आवश्यकता है बौद्ध दर्शन को आत्मसात करने की आवश्यकता है, ताकि फिर कोइ हमें मूर्ख
बना कर समाजवाद, या बहुजन हिताय की आड़ में अपने हित न साध सके, राष्ट्र सर्वोपरि।
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